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📅 Published on Friday, June 05, 2026

विश्व पर्यावरण दिवस: एक दिन का उत्सव, 365 दिन का प्रदूषण — क्या सच में बदलता है कुछ?

बड़बिल, 5 जून। 


आज विश्व पर्यावरण दिवस पर बड़बिल में भी एक भव्य कार्यक्रम का आयोजन किया गया। सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ हुईं, भाषण हुए और शहर के कुछ चुनिंदा हिस्सों में मुट्ठी भर पौधे लगाए गए। आयोजन स्थल पर तालियाँ बजीं, तस्वीरें खिंचीं और पर्यावरण बचाने का संदेश दिया गया। लेकिन जब यही बड़बिल का नागरिक अपने घर की ओर लौटता है, तो सड़क पर उसका सामना धूल के गुबार और ज़हरीले धुएँ से होता है। यह सवाल अब सड़क से लेकर सोशल मीडिया तक गूँज रहा है — क्या एक दिन के इस आयोजन से पर्यावरण को सचमुच कोई फ़ायदा होता है?

बड़बिल और आसपास के इलाकों की हवा में साल के 365 दिन भारी खनन ट्रकों से उड़ने वाली धूल ज़हर घोल रही है। लौह अयस्क संयंत्रों की चिमनियों से निकलता गाढ़ा धुआँ आसमान की साँसें रोक रहा है। हमारे कैमरे ने वह नज़ारे रिकॉर्ड किए हैं, जहाँ सड़क किनारे खड़े पेड़-पौधे धूल की मोटी परत से पूरी तरह ढके हुए हैं। उनकी हरी पत्तियाँ अब भूरी और बेजान नज़र आती हैं। यह भारी धूल जमाव पौधों के लिए एक गंभीर पर्यावरणीय तनाव है। विज्ञान बताता है कि यह धूल सूर्य के प्रकाश को रोकती है, पत्तियों के स्टोमेटा को बंद कर देती है, पत्तियों का तापमान बढ़ा देती है, रासायनिक और विषाक्त क्षति पहुँचाती है और कीटों को आकर्षित करती है। लगातार जमी रहने वाली यह धूल धीमी लेकिन निश्चित गिरावट लाकर पेड़-पौधों की पूर्ण मृत्यु का कारण बन सकती है।

वहीं, जल स्रोतों में लगातार गंदगी और कचरा प्रवाहित किया जा रहा है। नदियाँ और तालाब प्रदूषण की चपेट में हैं। ऐसे में, एक दिन कुछ पौधे लगाकर और कुछ सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ देकर यह मान लेना कि हमने पर्यावरण की रक्षा कर ली, एक भ्रम से अधिक कुछ नहीं। यह गंभीर सवाल उठता है कि क्या ये कार्यक्रम वास्तव में पर्यावरण में सकारात्मक बदलाव लाते हैं, या फिर यह महज़ एक प्रचार अभियान है? जब तक खनन ट्रकों की धूल पर नियंत्रण नहीं होता, कारखानों के धुएँ पर सख़्त निगरानी नहीं होती, और जल स्रोतों में गंदगी डालने वालों पर कार्रवाई नहीं होती, तब तक इस तरह के एक दिवसीय आयोजन केवल एक वार्षिक रस्म बनकर रह जाएँगे।

बाघु कहती है: "जंगल को सिर्फ़ तस्वीरों में हरा नहीं दिखना चाहिए, उसे सच में जीवित होना चाहिए।" पर्यावरण दिवस मनाने से कहीं ज़्यादा ज़रूरी है पर्यावरण को बचाने के लिए हर दिन काम करना।