भारतीय चुनाव आयोग में आंतरिक टकराव का बड़ा खुलासा: दो चुनाव आयुक्तों ने 10 महीनों में 14 बार दर्ज की आपत्ति, फॉर्म 6 और ERONet के केंद्रीकरण पर उठाए सवाल
द इंडियन एक्सप्रेस की जांच रिपोर्ट के आधार पर
दी बीबीएन पोस्ट (डेस्क) बड़बिल [ रिपोर्ट: संजय सिन्हा ] - द इंडियन एक्सप्रेस की एक बड़ी जांच रिपोर्ट ने भारतीय चुनाव आयोग (ECI) के तीन सदस्यीय ढांचे के भीतर अभूतपूर्व आंतरिक टकराव को उजागर किया है, जिसके अनुसार आधिकारिक रिकॉर्ड और आंतरिक नोट्स की समीक्षा से पता चलता है कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व में लिए गए फैसलों के खिलाफ नवंबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच 10 महीनों में कम से कम 14 बार औपचारिक आपत्तियां दर्ज कीं, और दोनों आयुक्तों ने आरोप लगाया कि देशव्यापी विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान महत्वपूर्ण नीतिगत कदम, सॉफ्टवेयर प्रतिबंध और कानूनी संशोधन उनकी जानकारी, मंजूरी या वैधानिक स्वीकृति के बिना अंजाम दिए गए, जिसके तहत 30 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में 13 करोड़ से अधिक नाम मसौदा मतदाता सूची से हटा दिए गए। रिपोर्ट के अनुसार, जुलाई 2026 में ऑनलाइन मतदाता पंजीकरण पोर्टल ने फॉर्म 6 में एक नया अनिवार्य घोषणा पत्र जोड़ा, जिसमें आवेदकों को यह बताना जरूरी कर दिया गया कि उनका या उनके माता-पिता या दादा-दादी का नाम 2000 के दशक की शुरुआत में हुए पिछले SIR के दौरान मतदाता सूची में था या नहीं, और इस पर चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने 16 मई को फाइल पर दर्ज किया कि फॉर्म 6 पंजीकरण अधिनियम नियम, 1960 के तहत निर्धारित है और विधि मंत्रालय द्वारा औपचारिक संशोधन पारित किए बिना इसे बदला नहीं जा सकता, जिसका चुनाव आयुक्त संधू ने 19 मई को समर्थन किया, लेकिन बदलाव बावजूद अपलोड कर दिए गए, जिसके बाद संधू ने 13 अगस्त को एक कड़ा नोट जारी करते हुए इस संशोधन को "अनधिकृत और अवैध" बताया और इसके तत्काल हटाने की मांग की ताकि उन युवा, पहली बार मतदान करने वाले मतदाताओं को उत्पीड़न या मताधिकार से वंचित होने का सामना न करना पड़े जिनके परिवार पिछले पुनरीक्षणों में छूट गए थे।
द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद, चुनाव आयोग ने एक बयान जारी करते हुए इन खुलासों को संदर्भित करने का प्रयास किया और कहा कि मसौदा चरणों के दौरान सदस्यों द्वारा उठाए गए नोट्स, प्रश्नों और तकनीकी सुझावों को मानक प्रशासनिक प्रथा है जो संस्थागत जांच और संतुलन सुनिश्चित करती है, और यह कि 10 महीनों में फैले 14 मसौदा नोट्स को उजागर करना एक विकृत दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है, जिसमें हजारों सर्वसम्मति निर्णयों और संयुक्त पहलों को नजरअंदाज किया गया है। आयोग ने जोर देते हुए कहा कि सभी अंतिम प्रकाशित आदेशों में पूर्ण कानूनी अधिकार है, हालांकि द इंडियन एक्सप्रेस ने नोट किया कि ECI की प्रतिक्रिया यह स्पष्ट करने में विफल रही कि फॉर्म 6 और ERONet एक्सेस संबंधी आपत्तियां तीन में से दो आयुक्तों की लिखित मांगों के बावजूद अनसुलझी क्यों रहीं।
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